This post is dedicated to all my frnds attending their last lecture at IMT today........... wish u all best of luck..
कुछ ख्वाब पुरे ,
कुछ अधूरे ,
चला लिए ,
एक बार फिर ,
उस गलियारे मैं ,
बिताये हंसीं पल जहाँ ,
वो मस्ती , वो खिलखिलाहट ,
गूंजती अब भी हे जहाँ ,
यारो संग बिताये पल ,
उस गलियारे में ,
आज चेहरा मायूस ,
आँखे बोझल ,
पैर लड़खड़ाते हे ,
चलते हुए ,
उस गलियारे में ,
न जाने कब
मिले साथ फिर,
सुनाई दे आवाज फिर ,
" तेरा लेक्चर हे क्या "
उस गलियारे में ,
न जाने कब ,
फिर दबोचे कोई मुझे कहे ,
" क्यों रे ज्यादा पढ़ रहा हे ,
कल कैंटीन क्यों नहीं आया "
उस गलियारे में ,
वो गलियारा न हो जैसे ,
जीवन का अहम् हिस्सा हुआ ,
शुरू हुआ २ साल पहले ,
वो ख़त्म किस्सा हुआ ,
उस गलियारे में ,
-अर्पित सिंह परिहार
Monday, 21 February 2011
Tuesday, 1 February 2011
संशय
यह खलबली , यह हड़बड़ी अब रास आ गयी ,
लेकिन शांति हर बार चाहता हूँ ,
ख्वाबो की नुमाइश में ,
अपने किस्सों का भी कारोबार चाहता हूँ ,
धरा से उठना भी नहीं हे ,
लेकिन हाथों में आसमाँ हर बार चाहता हूँ,
ख्वाबो की नुमाइश में ,
अपने किस्सों का भी कारोबार चाहता हूँ ,
झील की ख़ामोशी से प्यार भी हे ,
लेकिन नदी सा वेग हर बार चाहता हूँ
ख्वाबो की नुमाइश में ,
अपने किस्सों का भी कारोबार चाहता हूँ ,
संशय हे तो सृजन हे ,
लेकिन फिर भी एक दृष्टिकोण हर बार चाहता हूँ ,
ख्वाबो की नुमाइश में ,
अपने किस्सों का भी कारोबार चाहता हूँ
लेकिन शांति हर बार चाहता हूँ ,
ख्वाबो की नुमाइश में ,
अपने किस्सों का भी कारोबार चाहता हूँ ,
धरा से उठना भी नहीं हे ,
लेकिन हाथों में आसमाँ हर बार चाहता हूँ,
ख्वाबो की नुमाइश में ,
अपने किस्सों का भी कारोबार चाहता हूँ ,
झील की ख़ामोशी से प्यार भी हे ,
लेकिन नदी सा वेग हर बार चाहता हूँ
ख्वाबो की नुमाइश में ,
अपने किस्सों का भी कारोबार चाहता हूँ ,
संशय हे तो सृजन हे ,
लेकिन फिर भी एक दृष्टिकोण हर बार चाहता हूँ ,
ख्वाबो की नुमाइश में ,
अपने किस्सों का भी कारोबार चाहता हूँ
Saturday, 25 December 2010
Tuesday, 14 December 2010
बचपन खो गया
सर से शुरू होकर,
आँखों के रास्ते,
उदासी उसके चेहरे पर थी,
गला भी भर आया था,
दिल की धड़कने तेज हो गयी,
पेट में जैसे कुछ रेंगने लगा,
पांव कपकपाने लगे,
आत्मविश्वास , मेहनत , लगन जैसी,
कुछ उल जुलूल बातें कहकर,
लोग उसे और डराने लगे,
अभी तो सांप सिड़ी भी ठीक से खेलना कहा सीखा था,
फिर सफलता की सीड़ी , कामयाबी , मंजिल जैसे,
पाठ क्यों पढ़ाने लगे,
माँ का आँचल ही उसके लिए दुनिया थी,
तो देश और दुनिया की क्यों परवाह करे वो,
उसकी छाती की गर्माहट ही तो पहचानता था बस,
फिर भला ग्लोबल वार्मिंग उसे कैसे समझ में आता,
काश वो इन सारे टेंशन को खूंटी से टांग सकता,
जैसे वो अपने बैग , कपड़ो को टाँगता हे,
बस ऐसा सोचते सोचते वो सो गया,
और एक अनजानी सुबह की तलाश में,
एक बचपन और खो गया,
आँखों के रास्ते,
उदासी उसके चेहरे पर थी,
गला भी भर आया था,
दिल की धड़कने तेज हो गयी,
पेट में जैसे कुछ रेंगने लगा,
पांव कपकपाने लगे,
आत्मविश्वास , मेहनत , लगन जैसी,
कुछ उल जुलूल बातें कहकर,
लोग उसे और डराने लगे,
अभी तो सांप सिड़ी भी ठीक से खेलना कहा सीखा था,
फिर सफलता की सीड़ी , कामयाबी , मंजिल जैसे,
पाठ क्यों पढ़ाने लगे,
माँ का आँचल ही उसके लिए दुनिया थी,
तो देश और दुनिया की क्यों परवाह करे वो,
उसकी छाती की गर्माहट ही तो पहचानता था बस,
फिर भला ग्लोबल वार्मिंग उसे कैसे समझ में आता,
काश वो इन सारे टेंशन को खूंटी से टांग सकता,
जैसे वो अपने बैग , कपड़ो को टाँगता हे,
बस ऐसा सोचते सोचते वो सो गया,
और एक अनजानी सुबह की तलाश में,
एक बचपन और खो गया,
Wednesday, 29 September 2010
ख्वाहिश
मौलवी गाये आरती ,
पंडित पढ़े अजान ,
खुशियाँ बांटे हम सभी ,
दिवाली हो या रमजान ,
मंदिर बने की मस्जिद बने ,
न गीता कहे न कुरान ,
सब धर्मो का लक्ष्य बस ,
इंसान बना रहे इंसान ,
-अर्पित सिंह परिहार
पंडित पढ़े अजान ,
खुशियाँ बांटे हम सभी ,
दिवाली हो या रमजान ,
मंदिर बने की मस्जिद बने ,
न गीता कहे न कुरान ,
सब धर्मो का लक्ष्य बस ,
इंसान बना रहे इंसान ,
-अर्पित सिंह परिहार
Tuesday, 31 August 2010
कोई सपना देख कर तो देखो
यह कविता पढने से पहले कृपा कर इस विडियो को देखे , यह एक विज्ञापन हे , विश्वास करे मैंने यह कविता इस विज्ञापन के प्रसारित होने से कई साल पहले लिखी थी , परन्तु यह विज्ञापन मैंने अभी २ दिन पहले ब्रांड मैनेजमेंट की क्लास में देखा , तो कुछ अपना सा लगा , फिर उस पुरानी किताब जिसमे में लिखा करता हूँ , उस पर से धुल हटाई तो पाया की मैंने भी कुछ साल पहले ऐसा ही कुछ लिखा था , शायद आप लोगो को पसंद आये ,
कौन कहता हे , सपने सच नहीं होते ,
एक बार सपना देख कर तो देखो,
कभी कुछ बड़ा सोच कर तो देखो ,
आसमां को हाथो में महसूस कर के तो देखो ,
तारो को जमीन पर लाना कोई बड़ी बात नहीं ,
चाँद से दोस्ती कर के तो देखो ,
हाथ खोलकर किस्मत की बातें न करो तुम ,
एक बार मुट्ठी बंद कर के तो देखो ,
माथे की लकीरे बदल जाएँगी ,
कभी दिल से कुछ छह कर तो देखो ,
रेगिस्तान में भी फुल खिला सकते हो ,
एक बार बिज बो कर तो देखो ,
अँधेरे में भी राह ढूंढ़ लोगे ,
रौशनी की आस रख कर तो देखो ,
सपने सारे सच हो जायेंगे ,
एक बार सपना देख कर तो देखो ,
कौन कहता हे , सपने सच नहीं होते ,
एक बार सपना देख कर तो देखो,
कभी कुछ बड़ा सोच कर तो देखो ,
आसमां को हाथो में महसूस कर के तो देखो ,
तारो को जमीन पर लाना कोई बड़ी बात नहीं ,
चाँद से दोस्ती कर के तो देखो ,
हाथ खोलकर किस्मत की बातें न करो तुम ,
एक बार मुट्ठी बंद कर के तो देखो ,
माथे की लकीरे बदल जाएँगी ,
कभी दिल से कुछ छह कर तो देखो ,
रेगिस्तान में भी फुल खिला सकते हो ,
एक बार बिज बो कर तो देखो ,
अँधेरे में भी राह ढूंढ़ लोगे ,
रौशनी की आस रख कर तो देखो ,
सपने सारे सच हो जायेंगे ,
एक बार सपना देख कर तो देखो ,
Monday, 9 August 2010
जय हिंद
बस बहुत हुआ ,
अब सहा नहीं जाता ,
कुछ कहे बगैर ,
अब रहा नहीं जाता ,
फिर से आजादी का दिवस आया ,
भारत की याद आई ,
अब तो बिना मौको के ,
जय हिंद भी कहा नहीं जाता
अब सहा नहीं जाता ,
कुछ कहे बगैर ,
अब रहा नहीं जाता ,
फिर से आजादी का दिवस आया ,
भारत की याद आई ,
अब तो बिना मौको के ,
जय हिंद भी कहा नहीं जाता
Subscribe to:
Posts (Atom)
